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"अंदर की बातें.."

ये ख़यालात क़बतक हैं ? कहाँतक हैं ? कहीं रुकेंगे भी या पूरी ज़िंदगीभर ऐसेही साथ रहेंगें मेरे अतीत तक पता नहीं। ज़िंदगी का वो भी एक दौर था जब कुछ आज जैसे ही ख़यालात जहन में आया करतें थे। तब लगता था कि अपनीं भी ज़िंदगी में ऐसा वक़्त आएगा जब आज की शिकायतें तब गुज़रे हुए कल की यादें लगेगीं। आज जो सपनें हैं वो कल हक़ीक़तें बन जाएगी। सच कहुँ तो वो भी दौर आया था ज़िंदगी में। एक सपनें की तरह नहीं बल्कि क़ुछ उसके जैसा ही लगता था। सब लोग थोड़ी-बहुत इज्ज़त देते थे, अपने काम से पैसे मिलते थे, जो ख़्वाब पैसों से पूरें किए जा सकतें हैं उसके लिए बॅकअप मिल गया था, और सबसे अहम् और महत्वपूर्ण बात ये थी कि, अब और ज़िंदगी में करना क्या हैं? ये सवाल दिल को चीरता नहीं था। इन दिनों की तरह.. हाँ.. इन दिनों मैं और कुछ सोचता हूँ भी या नहीं पता नहीं। और उसके बाद एक दौर आया जो आज चल रहा हैं, ये कुछ पहले वाले जैसा ही हैं। बस कुछ बातें ज्यादा समझने लगीं है। हो सकता हैं कि ये हरदीन दिल को सुकून पहुंचाए बिना सोने के लिए ले जानेवाला दौर जल्द ही ख़त्म हो या फिर नहीं भी। अच्छा होनें की आशा करनें में क्या बुराई है?.. बहोत ज्यादा तकलीफ़ हो...

आठवणींचे मनोरे

"हो.. मी सांगितलं ना तुला, आले फक्त पाचच मिनिटात.." ती वेणीत गुंतलेले केस मोकळे करत करत त्याला आश्वासन देत होती.. त्यालाही माहीत होतं ती आता त्याला पाच मिनिटांचा दुरावा देऊन कुठं चालली आहे ते. करण हे फक्त आजच्यापुरतंच मर्यादित नव्हतं त्यांच्या जोडीच्या सहवासाला आता जवळ-जवळ दोन वर्ष होत आली होती. म्हणजे परस्परांच्या सवयी बऱ्यापैकी माहीत होत्या एकमेकांना.  रोज रात्री ती या वेळेला त्याच्याकडून हक्काने पाच मिनिटं मागून घ्यायची आणि अंघोळ करून यायची. हो ती रोज रात्री झोपण्यापूर्वी अंघोळ करायची.  त्यानं या वेळेला अंघोळ करण्यामागचं कारण जाणून घेण्यासाठी तिला बऱ्याचदा लाडीगोडी लाऊन झालेलं पण तिने नव्हतं त्याला कळू दिलं.. पण तोही बिचारा हार मानणाऱ्यांपैकी नव्हता. त्याला हे जाणून घेण्यापायी का अजून काय माहिती नाही पण रोज निदा फ़ाज़लींचा एक शेर या वेळी नक्की आठवायचा..  "हर इक आदमी में होतें हैं दसबीस आदमी, जब भी मिलोगे हर इक से मिलना.." आणि पुन्हा तो तिला अंघोळीसोबतच बऱ्याच गोष्टी बोलत्या करण्यासाठी चवताळून उठायचा. पण पुरुषांच्या अशा वागण्याला हॅलो देईल ती बाईची जात कसली?.. म्हणज...

#यादें.. भाग-२

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"हो हो हो... बस कर आता.  बस झाली की तुझी ही रोजचिच पिरपीर.. मला अजुन बूट चमकवायचेत." मैं मेरे एक हात में जूता पॉलिश करनेंवाला ब्रूश लेके उसे चेरी (जूते पॉलिश करनेवाला एक कलर) में डुबोते हुए दूसरी तरफ मेरे कान और दाहिने कंधे के बीच मे मोबाईल को फ़साँकर माँ से बात कर रहा था.. वो हररोज़ की तरह आज भी यही बोलते जा रहीं थी, " बेटा ट्रेनिंग से आने पर थोड़ा वक़्त खुद को दे दिया कर, फ़ुर्सत मिलतें ही अच्छे से नहाना। औऱ ज़्यादा ठंडा पानी हो तो नहाना मत। इन दिनों ठंड भी बहोत पड़ रहीं है। सिर्फ़ हात पैर धो लिया कर। ठंडे पानीं से नहाने पर तेरा सर दर्द करता हैं।" उसे ये तो पता था कि ठंडे पानी से मुझे क्या क्या होता हैं, लेकिन वो ये कैसे समझ पाती की यहां तकरीबन सात प्लाटूने याने की एक प्लाटून में पचास-पचपन बंदे गिने जाएं तो पूरे साढ़ेतीनसौ से चारसौ तक उसके बच्चें जैसे ही और बच्चे थे जो भी मेरी तरह पानीं कैसा भी, कितना भी हो लेकिन नहाना चाहतें थे। बात ये नहीं थी कि पानी नहीं था बल्कि इतने सारे रंगरूट ट्रेनिंग से आते ही सब के सब नहाने चल दिया करते थे और पूरे दिन की थकावट ज्यादा स...